हैलो बीकानेर। दिन में सुओ रात ने जुओ… बीकानेर में यह लाइन इतनी फेमश हुई कि बड़े-बड़े अखबारों में इस लाइन का इस्तेमाल किया था। आखिर यह लाइन बीकानेर में इतनी फेमश क्यों हुई? वैसे तो बीकानेर में बारह महिनों तक जुआ चलता रहता है लेकिन दिवाली के दिनों में बीकानेर के कुछ लोगों कि दिनचर्या ऐसी बन गई थी कि बीकानेर के किसी व्यक्ति ने इस लाइन को लिख डाला।

बीकानेर शहर के परकोटे के अन्दर रहने वाले लोगों की दैनिक दिनचर्या पूरे भारत में चर्चा का विषय बनी हुई है। घड़ी को अपने हिसाब से चलाने वाले बीकानेर शहर के लोग त्यौहारों को अपनी ही मौजमस्ती से मनाने के लिए विख्यात है। दिवाली त्यौहार को भी अपने अनुठे अंदाज से मनाने वाले बीकानेर शहर के लोग सगुन के नाम पर दिवाली से एक महिने पहले ही जुआ खेलना शुरू कर देते है।

दिन भर नींद में सोते रहते है और रात भर जुआ खेलते रहते है इसी दिनचर्या को देखकर लिखी गई है यह लाइन दिन में सुओ रात ने जुओ…. कई बड़े-बड़े नामी पुलिस अधिकारी बीकानेर में रह चुके है लेकिन इस जुआ प्रस्था को आज तक कोई बंद नहीं करा पाया है। अब तो यह लोगों का व्यापार बन चुका है। बारह महिने जुआ खेलने वाले जुआरियों को दिवाली के त्यौहार का बेसब्री से इंतजार रहता है। क्योंकि दिवाली पर वो लोग भी सगुन के नाम पर जुआ खेलते है जो बारह महिने नौकरी या व्यापार किया करते है।

शहर की तंग गलियों में अगर आप देर रात को कही जा रहे है और कुछ लोग कहीं कौने में बैठे ताश खेल रहे हो तो वो दिवाली पर सगुन के नाम पर चलने वाला जुआ ही हो सकता है। पुलिस भी क्या करें बीकानेर शहर की तंग गलियों से अभी तक वो पूरी तरह अवगत होती है की उतने में उनका स्थानान्तरण कहीं ओर हो जाता है। दिवाली पर सगुन के नाम पर चलने वाला जुआ कब तक बीकानेर में चलता रहता है यह तो वक्त ही बतायेगा…… और यह लाइन ‘दिन में सुओ रात ने जुओ … बीकानेर के लिए कब सही साबित होती है!