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फिल्म दम लगा के हईशा में अपने दमदार अभिनय से वाहवाही बटोर चुकी अभिनेत्री भूमि पेडनेकर अब एक छोटे शहर की कहानी फिल्म ‘टॉयलेट : एक प्रेमकथा’ में अक्षय कुमार के साथ दिखेंगी. फिल्म में मनोरंजन है, तो एक मजबूत सामाजिक संदेश भी.
इस फिल्म से आप कैसे जुड़ीं?
मेरी एक मुलाकात हुई थी नीरज सर के साथ. वह दस मिनट की वह मुलाकात थी. तब मैं अमृतसर के एक होटल में थी. वहां फिल्म के लेखक भी मौजूद थे. उन्होंने जब नरेशन दिया, तो मैं पागल हो गयी. उसी वक्त तय कर लिया कि यह फिल्म तो करनी ही है. अक्षय सर इस फिल्म से जुड़े हैं, यह बात मुझे बाद में मालूम हुई. तब बेहद खुश हो गयी थी. इसमें उ;;;;;नसे बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था. इस फिल्म को करने के पीछे वजह है- मेरी यह दूसरी फिल्म है, इसमें अक्षय कुमार हैं, यह सामाजिक मुद्दे पर बनी है, इसलिए जाहिर तौर पर इसे लेकर मेरा उत्साह दुगुना है.
आपको फिल्म की स्क्रिप्ट में क्या खास लगा?
खास यह लगा कि यह फिल्म एक बहुत ही खास लव स्टोरी है, जिसमें एक संदेश भी है. यह फैमिली इंटरटेनर फिल्म है, जो आपके चेहरे पर एक मुस्कुराहट लायेगी. इसमें साधारण लोगों की कहानी है. इनका विलेन है टॉयलेट. संदेशप्रद होने के बावजूद यह फिल्म आपको ज्यादा ज्ञान नहीं देती. यह आपका मनोरंजन करेगी और अपनी बात भी कह देगी.
क्या आपको लगता है कि टॉयलेट की समस्या सिर्फ गांवों या छोटे शहरों तक ही सीमित है?
मैं इस बात को नहीं मानती हूं. यह बड़े शहरों की भी समस्या है. मैं हमेशा से मुंबई में ही रही हूं. मुझे याद है जब मैं सुबह स्कूल जाती थी, तो लोगों को रेल की पटरियों के पास छाता लेकर बैठे देखती थी. तब पता नहीं था कि यह परेशानी इतनी बड़ी है. आांकड़े दूं तो आप चौंक जायेंगे. हमारे देश की 54 प्रतिशत आबादी के पास टॉयलेट नहीं है. भारत विश्व का पहला देश है, जहां इतनी तादाद में लोग खुले में शौच जाते हैं. आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर बलात्कार की घटनाएं इसी दौरान होती हैं. हमारे देश में कई जगह औरतें, पुरुषों से ज्यादा काम करती हैं. हम दस मिनट भी बाथरुम रोक नहीं सकते हैं. वे 10 से 14 घंटे तक रोकती हैं. उसके बाद भी डर होता है कि खुले में उसे कहीं सांप या बिच्छू न काट ले. रेप न हो जाये. कोई वीडियो न बना ले. कोई छेड़छाड़ न कर दे. वे लोग इस डर में जिंदगी जी रही हैं. उनके बारे में सोचने भर से मुझे सांस लेने में परेशानी होती है.
क्या इसके लिए आप सरकार को दोष देंगी, जो लोगों को एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं दे पा रही है?
मैं सरकार से ज्यादा इसके लिए लोगों की सोच को दोष दूंगी. ट्रेलर में भी यह दिखाया गया है कि जिस आंगन में तुलसी है, वहां शौच कैसे बनाये. जिस घर में खाना बना रहा हो, वहां उन चीजों के लिए कैसे जगह हो. सरकार ने आपको इंफ्रास्टचर दिया है, मगर आप कहां उसका उपयोग करते हैं. सरकार से पैसे लेकर टॉयलेट की जगह पर लोगों ने दुकाने बना ली हैं और सब्जी बेच रहे हैं. इन सब अहम मुद्दे को हमने बहुत ही प्यार से अपनी कहानी में पिरोया है. मेरा दावा है कि जब लोग थिएटर से बाहर निकलेंगे, तो उनके चेहरे पर एक मुस्कुराहट होगी.
क्या निजी जिंदगी में आप कभी ऐसे मुद्दे से जुड़ीं?
मैं ऐसे परिवार से आती हूं, जहां पर हम ऐसे सोशल इश्यूज से हमेशा जुड़े रहे हैं. बहुत कम पैसे लगते हैं एक बाथरूम बनाने में. एक गांव में अगर  डेढ़ सौ घर हैं और सभी मिल कर दो-चार टॉयलेट भी बनवा लें, तो उनकी समस्या का हल हो जायेगा. लेकिन परेशानी यह है कि वह टॉयलेट बनाना ही नहीं चाहते. समस्या सोच बदलने की है, जो हमारी फिल्म कर रही है.
अक्षय कुमार के साथ शूटिंग का अनुभव कैसा रहा?
बहुत ही खास था. उनका प्रोफेशनलिज्म काबिलेतारीफ है.  उनके कुछ मूल्य रहे हैं. मैं चाहती हूं कि मेरे कैरियर में भी मैं उसी तरह की वैल्यूज को बरकरार रख पाऊं. शूटिंग के पहले दिन से ही अक्षय सर ने मुझे बहुत कंफर्टेबल फील कराया. शूटिंग के दौरान वह सुपरस्टार नहीं रहते. दोस्त की तरह बरताव करते हैं. उन्होंने पहले दिन मुझे नर्वस देखकर कहा कि हम मजा करेंगे, टेंशन मत लो. हम दोस्त हैं. कोई सीनियर-जूनियर नहीं. उन्होंने मेरी फिल्म दमलगाकर हईशा भी देखी थी. उन्हें मेरा काम भी पसंद आया था.
आपने कहा कि यह आम लोगों की फिल्म है, तो शूटिंग के दौरान आपने क्या अनुभव किया?
हां, मैं थोड़ी दीवानी हूं. मैं तो हर फिल्म की शूटिंग के पहले होमवर्क करती ही हूं. जहां पर हमारी शूटिंग होनी थी, मैं वहां पहले ही पहुंच जाती थी. वहां की लड़कियों से मिलती थी. उनकी परेशानी समझती थी. उनके पास भी सपने हैं. वे अपने बलबूते पैसे कमाना चाहती हैं. अपने घरवालों की मदद करना चाहती हैं, लेकिन उनके पास जरिया नहीं है. हां, धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है.
साभार : प्रभात खबर

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