हैलो बीकानेर न्यूज़ । नवरात्रि के दिनों में गरबा की धूम अलग ही रौनक जमाती है। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो नवरात्रि का इंतजार ही इसलिए करते हैं क्योंकि इस दौरान उन्हें गरबा खेलने, रंग-बिरंगे कपड़े पहनने की अवसर मिलेगा। पिछले कुछ सालो से राजस्थान में भी गरबा/डंडिया का खूब प्रचलन देखने को मिल रहा है। बीकानेर में भी गरबा/डंडिया के खूब आयोजन होने लग गए है।

आज है माखन भोग में डंडिया प्रोग्राम 

बीकानेर में भी अलग-अलग समाज के लोग अपनी – अपनी तरह से नवरात्रा का त्यौहार मानते है। आज बीकानेर में माहेश्वरी युवा संगठन (शहर) बीकानेर द्वारा नवरात्रा के पावन अवसर पर 13 अक्टुबर शनिवार को माखन भोग पुगल फांटा बीकानेर में डंडिया प्रोग्राम का आयोजन हो रहा है।

संगठन के प्रचार प्रसार मंत्री ऐश्वर्य बिनानी ने बताया की माहेश्वरी युवा संगठन (शहर) बीकानेर द्वारा पहली बार माहेश्वरी डांसिंग नाईट का आयोजन किया जा रहा है। जिसमे केवल माहेश्वरी ही भाग ले सकते है। बिनानी ने बताया की कार्यक्रम की तैयारिया पूरी हो चुकी है। बिनानी ने बताया डंडिया प्रोग्राम के पास निम्न स्थान/व्यक्ति के पास मिल जायेंगे।

1. माहेश्वरी स्टूडियो जस्सूसर गेट 2. बिन्नानी बन्धु 3. टूल हाउस 4. सागर भुजिया गंगाशहर 5. G D sales मोर्डन मार्केट 6. शुभम राठी पारीक चोक 07  शेखर पेडिवाल जवाहर नगर

गरबा का इतिहास

भारत का पश्चिमी प्रांत, गुजरात तो वैसे ही गरबे की धूम के लिए अपनी अलग पहचान रखता है लेकिन अब तो भारत समेत पूरे विश्व में नवरात्रि के पावन दिनों में गरबा खेला जाता है। ये सब तो बहुत कॉमन बातें हैं जो अमूमन सभी लोग जानते हैं। गरबा खेलना और गरबे की रौनक का आनंद उठाना तो ठीक है लेकिन क्या आप जानते हैं कि गरबा खेलने की शुरुआत कहां से हुई और नवरात्रि के दिनों में ही इसे क्यों खेला जाता है?  गरबा और नवरात्रि का कनेक्शन आज से कई वर्ष पुराना है। पहले इसे केवल गुजरात और राजस्थान जैसे पारंपरिक स्थानों पर ही खेला जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसे पूरे भारत समेत विश्व के कई देशों ने स्वीकार कर लिया। गरबा के शाब्दिक अर्थ पर गौर करें तो यह गर्भ-दीप से बना है। नवरात्रि के पहले दिन छिद्रों से लैस एक मिट्टी के घड़े को स्थापित किया जाता है जिसके अंदर दीपक प्रज्वलित किया जाता है और साथ ही चांदी का एक सिक्का रखा जाता है। इस दीपक को दीपगर्भ कहा जाता है। दीप गर्भ के स्थापित होने के बाद महिलाएं और युवतियां रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर मां शक्ति के समक्ष नृत्य कर उन्हें प्रसन्न करती हैं। गर्भ दीप स्त्री की सृजनशक्ति का प्रतीक है और गरबा इसी दीप गर्भ का अपभ्रंश रूप है। आपने देखा होगा कि जब महिलाएं समूह बनाकर गरबा खेलती हैं तो वे तीन तालियों का प्रयोग करती हैं। आज का गरबा नृत्य पूरी तरह पारंपरिक रूप लिए हुए है जिसमें राजनीति का स्वरूप बिल्कुल न्यूनतम या कहें ना के बराबर है। आप इसके व्यवसायिक स्वरूप को भी देख सकते हैं।