पिता पुत्र की कृतियों का एक साथ लोकार्पण, साक्षी बना शहर

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अनुभूतियाँ ही सृजन का आधार- डॉ. देवल
हैलो बीकानेर,। राजस्थानी के वरिष्ठ कवि-अनुवादक पद्म श्री डॉ. सी.पी. देवल ने कहा है कि सृजन व्यक्ति के अभिव्यक्ति का वह सोपान है जब वह समाज को कुछ देने के लिए तत्पर होता है। अनुभुतियाँ ही सृजन का आधार है। कला का माध्यम दुरूह है, बिरले ही होते हैं जो इस क्षेत्र में आते हैं। यह ऐसा माध्यम है जहाँ दूसरों के दुख में रोना पड़ता है। यह उद्गार डॉ. देवल ने रविवार को स्थानीय धरणीधर रंगमंच पर आयोजित पुस्तक लोकार्पण समारोह में “विरासत सम्वर्द्धन” में व्यक्त किए। वरिष्ठ नाटककार कवि श्री लक्ष्मीनारायण रंगा की कृति ‘रंग के आँसू’ और राजस्थानी कथाकार कवि कमल रंगा की कृति “बसन्त म्हारी दीठ” में का लोकार्पण करते हुए उन्होंने कहा कि बीकानेर कला और संस्कृति की वजह से पहचाना जाने वाला शहर है और यह देखना सुखद है कि एक पिता अपने पुत्र को शब्द की विरासत सौंपता है। यह बीकानेर में ही सम्भव है। यह कार्यक्रम रचाव संस्थान व कलासन प्रकाशन की ओर से आयोजित किया गया। उन्होंने कहा कि कमल रंगा की कविता जहाँ रिश्तों की पड़ताल है, एक ऐसा समय जब चारों ओर हिंसा और अराजकता है, ये कविताऐं सम्भावनाऐं जगाती हैं। वहीं लक्ष्मीनारायण रंगा के नाटक समय का सत्य है।

bannerकार्यक्रम के अध्यक्ष राजस्थानी के वरिष्ठ कवि आलोचक डॉ. अर्जुनदेव चारण ने इस अवसर पर कहा कि नाटक का तारतम्य साहित्य की दूसरी विधाओं से अलग है, यही विधा कविता या कहानी की तरह किसी एक व्यक्ति के वश की बात नहीं है। नाटककार जब नाटक लिखता है उसकी इच्छा होती है कि नाटक खेला जाए। नाटक खेलने में ही नाटक की पूर्णता होती है। नाटक वस्तुतः अभिनेता का माध्यम है। शब्द की साधना एक पावन कर्म है। बिरले ही होते हैं जिन पर माँ सरस्वती का वरदान होता है। रंगा जी के परिवार पर माँ सरस्वती की कृपा अकूत है और यही वजह है कि सृजन की धारा सतत प्रवाहित हो रही है। उन्होंने कहा कि दोनों ही रचनाकारों की कृति का केन्द्र रस है।
लोकार्पण समारोह में सृजन साक्षी के रूप में बोलते हुए वरिष्ठ कवि भवानीशंकर व्यास “विनोद” ने श्री लक्ष्मीनारायण रंगा को बीकानेर की रंग परम्परा का एक मजबूत स्तम्भ बताते हुए कहा कि लक्ष्मीनारायण जी ने रंग लेखन के माध्यम से रंग आन्दोलन को मजबूती प्रदान की। श्री कमल रंगा को उन्होंने राजस्थानी भाषा मान्यता आन्दोलन का एक ऐसा अग्रदूत बताया जिसने न सिर्फ लगातार मान्यता के लिए संघर्ष किया बल्कि राजस्थानी में सतत् लेखन करते हुए भाषा के भण्डार को भी समृृद्ध किया।
इस अवसर पर “रंग के आँसू” कृति के लेखक श्री लक्ष्मीनारायण रंगा ने कहा कि जो रचेगा वही बचेगा, मेरा मूल मंत्र है और इसी के आधार पर अब तक शब्द की साधना करता रहा हूँ। अब तक जो भी लिखा है वह इसी समाज का दिया हुआ है और लिखकर वापस समाज को ही अर्पित कर रहा हूँ। “बसन्त म्हारी दीठ” के लेखक श्री कमल रंगा ने इस अवसर पर कहा कि लेखन उन्हें विरासत में मिला है और इस विरासत को सम्भाल कर वे गौरवान्वित महसूस करते हैं। उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा की मान्यता का सपना उनके लिए सबसे बड़ा है और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इस मौके पर उन्होंने अपनी कविताऐं भी सुनाई।
कृति पर पत्र वाचन करते हुए रंगकर्मी अशोक जोशी ने कहा कि श्री लक्ष्मीनारायण रंगा के नाटक मंचीय हैं और सम्भावनाओं से भरे हैं। इनके नाटकों में आधुनिक युगबोध है, जो निर्देशकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। “बसन्त म्हारी दीठ में” पर पत्र वाचन करते हुए राजस्थानी के कवि आलोचक श्री दुलाराम सारण ने कहा कि कमल जी की कविताऐं स्वप्न, स्मृति और यथार्थ की अनुभूतियों से निकली है और पाठक को खुद से जोड़ने में समर्थ हैं।
लोकार्पण के पश्चात् श्री लक्ष्मीनारायण रंगा ने अपनी कृति “रंग के आँसू” वरिष्ठ रंगकर्मी श्री एल.एन. माथुर व बीकानेर विधानसभा (पश्चिम) के विधायक डॉ. गोपाल जोशी को समर्पित की तथा कमल रंगा ने अपनी कृति “बसन्त म्हारी दीठ में” वरिष्ठ कथाकार श्री मालचन्द तिवाड़ी को समर्पित की।
इस अवसर पर विरासत संवर्द्धन के तहत ऐसे रचनाकार व रंगकर्मियों को सम्मानित किया गया जिन्हें शब्द व रंग विरासत में मिले हैं। सम्मानित होने वालों में डॉ. सुलक्षणा दत्ता, डॉ. उमाकान्त गुप्त, संजय पुरोहित, मन्दाकिनी जोशी, डॉ. नीरज दैया, जाहन्वी केवलिया, इरसाद अजीज, सुधेश व्यास, आनन्द वी. आचार्य, मधु आचार्य, विपीन पुरोहित, रितु व्यास, अशोक खत्री व जुबेर खान शामिल थे।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में स्वागत उद्बोधन देते हुए वरिष्ठ पत्रकार लूणकरण छाजेड़ ने कहा कि श्री लक्ष्मीनारायण जी के सृजन और कमल जी के राजस्थानी भाषा के लिए संघर्ष से कोई भी अपरिचित नहीं है। लेकिन आज का दिन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि पहली बार पिता और पुत्र की कृति का एक साथ लोकार्पण हो रहा है। आभार कासिम बीकानेरी ने जताया। कार्यक्रम का संचालन हरिश बी. शर्मा ने किया। फोटो : राजेश छंगाणी