इस सप्ताह की सुर्खियां: निकाय चुनावों ने बढ़ाई धुकधुकी, भाजपा हारी बीकानेर निगम
इस सप्ताह की सुर्खियां
हैलो बीकानेर। स्थानीय सरकार के लिए राजस्थान में जनता के मतदान ने दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों की धुकधुकी बढ़ा दी है। इस चिंता के चलते दोनों ही दलों को यह पता चल गया है कि पंचायतों के चुनाव में मुकाबला नेक-टू-नेक रहना है। अगर किसी ने भी थोड़ी-सी चूक कर दी तो सारा मामला हाथ से निकल जाएगा। बीकानेर जिले में जिस तरह के परिणाम सामने आए हैं, यह साफ हो गया है कि भाजपा और कांग्रेस अब यहां की जनता की पहली पसंद नहीं रही है, अगर टिकट वितरण में जरा सी चूक भी कर दी तो जनता सबक सिखा सकती है। भाजपा के साथ इस बार यही हुआ। टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने न सिर्फ खम ठोककर चुनाव लड़ा बल्कि भाजपा प्रत्याशियों की जीत में भी रोड़ा बने। इससे यह भी साफ हुआ कि संगठन पूरी तरह से निस्तेज रहा। बूथ मैनेजमैंट से लेकर पन्ना प्रमुख तक की सारी व्यवस्थाएं हवा हो गई। भाजपा 27 में सिमट गई और जैसा कि तीन अंक पहले से ही इस कॉलम में हम कहते आए कि कांग्रेस अपर हैंड है, भाजपा ने इस लाइन पर संज्ञान नहीं लिया और कांग्रेस अपने विवादों के बावजूद संभल-संभलकर कदम रखते हुए आगे बढ़ी।
कांग्रेस ने अनिल कल्ला को टिकट थमाकर चुनाव को रोचक बना दिया। मेयर पद के दावेदार भाजपाइ दीपक पारीक इतने बड़े अंतर से हार जाएंगे, नहीं लगता था, लेकिन परिणाम सामने है। वाया कांगे्रस अध्यक्ष मदन मेघवाल नवरतन डागा की एंट्री हुई, जिन्हें भी पहले-पहले कतिपय कारणों से महापौर का दावेदार माना जाता रहा, अनिल कल्ला के मैदान में आने के बाद उन्होंने भी दावेदारी ठोक दी है।
मदन मेघवाल की अध्यक्षता वाले शहर कांग्रेस संगठन पर पहली बार सिंबल चोरी का आरोप भी लगा। इस आरोप को सही बताने वालों का कहना है कि प्रदेश में यह घटना गंभीर मानी गई, इस पर कोई कार्रवाई होती, उससे पहले ही मोहित अरोड़ा ने शहर अध्यक्ष को पीट लिया, मामला घूम गया।
इन परिस्थितियों ने पूरे चुनाव के केंद्र में डॉ. बी. डी.कल्ला को ला खड़ा किया, लेकिन भाजपा का सारा चुनाव अकेले जेठानंद व्यास के कंधे पर चला। केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल इस चुनाव में अपनी गरिमा के अनुरूप ही नजर आए। विधायक सिद्धिकुमारी के लिए कुछ नहीं कहना ही कहने के बराबर है। भाजपा शहर अध्यक्ष सुमन छाजेड़ अधिकृत होते हुए भी अधिकार-हीन दिखती रहीं। पूर्व महापौर सुशीलाकंवर राजपुरोहित खुद अपना ही वार्ड नहीं बचा सकीं। इस चुनाव में भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गज उखाड़ दिए गए। मोहन सुराना की पत्नी मधु सुराना, गोपाल अग्रवाल, अशोक प्रजापत, मुकेश ओझा, भूपेंद्र शर्मा का हारना भी बड़ी घटना रहा।
कांग्रेस ने अपने एक प्रत्याशी अनिल कल्ला को जिताने के लिए आसपास के कई प्रत्याशियों को जितवा दिया। पैक्ट एक ही था कि आप अनिल कल्ला को जिताओ, आपके रिश्तेदार कांग्रेस प्रत्याशी को हम जिताएंगे। इस युक्ति ने कांग्रेस को 42 के जादुई आंकड़े तक पहुंचा दिया।
मजे लिए निर्दलीयों ने। शुभकरण गहलोत की दावेदारी को राष्ट्रव्यापी रीच मिली। रील्स में शुभकरण छाये रहे। सुषमा शर्मा ने कांग्रेस और भाजपा के बीच से जीत का रास्ता निकाल लिया। निशा पारीक, प्रतीक स्वामी, भगवतीप्रसाद गौड़ की जीत पहले से ही नजर आ रही थी। लक्ष्मी कातेला, दीपक तंवर, संजय राखेजा और विकास सियाग का जीतना सिंबल पर लडऩे वालों को बड़ा अफसोस दे गया।
भाजपा के लिए प्रतिकूल माहौल के बावजूद सुरेंद्रसिंह शेखावत, भगवानसिंह मेड़तिया और श्यामसिंह हाडला जीतने में कामयाब रहे। बीकानेर जिले में हुए निकाय चुनाव में भी निर्दलीयों ने पार्टियों को खूब परेशान किया। नोखा में सीपीआई (एम) सिंबल पर विकास मंच जीत गया। श्रीडूंगरगढ़ में सबसे बड़ी पार्टी बनकर हालांकि कांग्रेस उभरी, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े से दूर रही। देशनोक में चौंकाने वाले परिणाम देते हुए कांग्रेस आई। लूनकरणसर और खाजूवाला में भाजपा आगे रही।
कुल मिलाकार स्थानीय निकाय चुनाव पूरी तरह से कांग्रेस व भाजपा के लिए अलार्मिंग है। आने वाले दिन मेयर की राजनीति के लिए हैं। मेयर के चुनाव 21 सितंबर को होने है। इस बीच शहर भी मेळे-मगरिये हो आएगा। उम्मीद की जा सकती है कि मेळों के बाद शहर की सरकार रफ्तार पकड़े। गर्मी और उमस से भरे इस मौसम में मेले में जा रहे लोगों को आस है कि 'जमाने' के संकेत मिलेंगे। फिजाओं में यह गीत गूंजने लगा है-
भादवो भलेरो आवै ठंडी मीठी हवा चालै मन पंछी बण जावै
भगता रा भाग जागै मनड़ौ रुणीचै भागै, बाबे रो मेळो जद आवै
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