अगले दशक तक भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र में कारोबार साढ़े तीन लाख करोड़, पढ़ें न्यूज़
नई दिल्ली। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा है कि नीतिगत सुधारों, निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और तेजी से विस्तार करते नवाचार तंत्र के बल पर अगले दशक में भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र में कारोबार मौजूदा 8-9 अरब डॉलर से बढ़कर लगभग करीब 40-45 अरब डॉलर(3.3 लाख करोड़ से 3.7 लाख करोड़ रुपये) होने को तैयार है।
राज्य मंत्री ने कहा, "भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में आया यह बदलाव देश भर में हो रहे बड़े परिवर्तन को दर्शाता है, जहां विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बन गये हैं। हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक विज्ञान और समाज के बीच बढ़ता जुड़ाव रहा है। इससे नागरिक अब खुद को भारत की वैज्ञानिक प्रगति में एक हितधारक के रूप में देख रहे हैं।"
उन्होंने कहा, "सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज आम नागरिक भारत की वैज्ञानिक प्रगति से जुड़ाव महसूस करता है और इसमें अपनी हिस्सेदारी देखता है।" श्री सिंह ने कहा कि सार्वजनिक चर्चाओं में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को मिल रहा बढ़ावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिन्होंने अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधनों के माध्यम से विज्ञान-आधारित पहलों को लगातार राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल किया है। स्वच्छ भारत, डिजिटल इंडिया, डिजिटल हेल्थ, डीप ओशन मिशन और गगनयान जैसे कार्यक्रमों ने विज्ञान और नवाचार को भारत की विकास यात्रा के केंद्र में स्थापित करने में मदद की है।
उन्होंने कहा, "अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और उन्नत तकनीकों जैसे अग्रणी क्षेत्रों में भारत की बढ़ती क्षमताओं ने देश की वैश्विक स्थिति को मजबूत किया है।" अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप्स की बढ़ती पैठ पर उन्होंने कहा कि भारत में कुछ वर्ष पहले तक जहां गिने-चुने अंतरिक्ष स्टार्टअप थे, आज वहां 400 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप हैं, जो एक जीवंत और तेजी से बढ़ते इकोसिस्टम में अपना योगदान दे रहे हैं। उन्होंने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी की बाधाओं का भी जिक्र किया और कहा कि हर बड़ा अंतरिक्ष कार्यक्रम निरंतर सीखने और सुधार के माध्यम से ही विकसित होता है।
उन्होंने कहा, "मिशनों के दौरान आने वाली चुनौतियां प्रणालियों को मजबूत बनाने, तैयारियों को बेहतर करने और भविष्य के मिशनों को अधिक सुदृढ़ करने में योगदान देती हैं। अंतरिक्ष मिशनों में मिलने वाली अस्थायी बाधाओं को वैज्ञानिक प्रगति और तकनीकी विकास के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।"
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