HelloBikaner
BREAKING NEWS
• कल 11 सितंबर को बीकानेर के अधिकांश क्षेत्रों में रहेगी बिजली गुल, पढ़ें न्यूज • अगर आप को भी नहीं मिलती है 150 यूनिट फ्री बिजली, तो पढ़ें यह न्यूज़ • निर्दलीय प्रत्याशी सुरेंद्र ने दीपक को दिया समर्थन • कहा- हर कार्यकर्ता की संगठन में विशिष्ट पहचान, मेहनत और निष्ठा से मिलता है अवसर • पारीक को गुड़ व फ्रूट से तौला, पुष्पमालाएं पहनाकर किया स्वागत • कल 11 सितंबर को बीकानेर के अधिकांश क्षेत्रों में रहेगी बिजली गुल, पढ़ें न्यूज • अगर आप को भी नहीं मिलती है 150 यूनिट फ्री बिजली, तो पढ़ें यह न्यूज़ • निर्दलीय प्रत्याशी सुरेंद्र ने दीपक को दिया समर्थन • कहा- हर कार्यकर्ता की संगठन में विशिष्ट पहचान, मेहनत और निष्ठा से मिलता है अवसर • पारीक को गुड़ व फ्रूट से तौला, पुष्पमालाएं पहनाकर किया स्वागत

लंदन में नीलाम होगा: राजपरिवार का 17वीं सदी का 'स्मार्टफोन', 25 करोड़ रुपये तक...

4 months ago
राजपरिवार का 17वीं सदी का 'स्मार्टफोन', 25 करोड़ रुपये तक...

लंदन में नीलाम होगा

जयपुर के शाही संग्रह की सबसे बेशकीमती वैज्ञानिक विरासतों में से एक 17वीं शताब्दी का एक विशाल 'एस्ट्रोलेब' (खगोलीय गणना यंत्र) आगामी 29 अप्रैल को लंदन के सोथबी नीलामी घर में वैश्विक बोली के लिए तैयार है। पीतल से बने इस अद्भुत यंत्र को विशेषज्ञ अपनी बहुमुखी क्षमताओं के कारण उस दौर का 'सुपरकंप्यूटर' और 'प्राचीन स्मार्टफोन' करार दे रहे हैं। सोथबी के 'इस्लामिक एंड इंडियन आर्ट' विभाग के प्रमुख बेनेडिक्ट कार्टर ने इस यंत्र को अब तक का सबसे विशाल और दुर्लभ खगोलीय उपकरण बताया है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें जयपुर के पूर्व महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय के निजी संग्रह से जुड़ी हैं।

 


महाराजा के निधन के बाद यह उनकी पत्नी और विश्वप्रसिद्ध महारानी गायत्री देवी के पास रहा, जहां से यह कालांतर में एक निजी संग्रह का हिस्सा बन गया। अब पहली बार इसे सार्वजनिक मंच पर प्रदर्शित और नीलाम किया जा रहा है। तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टि से यह यंत्र अपने समय की कला का शिखर है। इसका वजन 8.2 किलोग्राम और ऊंचाई लगभग 46 सेंटीमीटर है, जो सामान्य एस्ट्रोलेब की तुलना में चार गुना बड़ा है। इसकी दुर्लभता और शाही जुड़ाव को देखते हुए, विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह 1.5 से 2.5 मिलियन पाउंड (लगभग 15 से 25 करोड़ रुपये) के बीच बिक सकता है, जो खगोलीय यंत्रों की नीलामी के पिछले सभी विश्व रिकॉर्ड तोड़ सकता है।

 


इस यंत्र की सबसे बड़ी खूबी इसका 'ऑल-इन-वन' गैजेट होना है। ऑक्सफोर्ड की इतिहासकार डॉ. फेडेरिका गिगेंटे के अनुसार, इसके जरिये 17वीं सदी में खगोलशास्त्री सूर्योदय-सूर्यास्त का समय, तारों की सटीक स्थिति, किसी कुएं की गहराई और इमारतों की ऊंचाई माप सकते थे। इसके अलावा, इसका उपयोग मक्का की दिशा निर्धारित करने और पंचांग की सहायता से सटीक कुंडलियां तैयार करने के लिए भी किया जाता था। सांस्कृतिक रूप से यह यंत्र मुगलकालीन भारत की मिली-जुली विरासत का जीवंत प्रमाण है। इसे 17वीं सदी की शुरुआत में लाहौर (अब पाकिस्तान) के मशहूर 'लाहौर स्कूल' के दो भाइयों कायम मुहम्मद और मुहम्मद मुकीम ने बनाया था।

 

 


इस यंत्र पर तारों के नाम फारसी में अंकित हैं, जिनके ठीक बगल में उनके संस्कृत समकक्ष नाम देवनागरी लिपि में उकेरे गये हैं, जो उस दौर में विज्ञान और संस्कृति के अद्भुत समन्वय को दर्शाता है। यह एस्ट्रोलेब लाहौर के तत्कालीन प्रशासक आका अफजल के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया था, जो मुगल सम्राट जहांगीर और शाहजहां के शासनकाल में ऊंचे पदों पर तैनात थे। इसमें 94 शहरों के अक्षांश और देशांतर के साथ-साथ 38 तारों के पॉइंटर्स दिये गये हैं, जो आज भी इतने सटीक हैं कि किसी भी खगोलीय पिंड की ऊंचाई की एकदम सही डिग्री बता सकते हैं। विश्व भर के संग्रहालय और निजी संग्रहकर्ता इस अनूठी वैज्ञानिक धरोहर को हासिल करने के लिए उत्सुक हैं।

Join for Latest News

हमारे चैनल से जुड़ें और सभी अपडेट सबसे पहले पाएँ

Share: